ज़िंदगी तेरे कानों में
हज़ारों बार
मैंने चुपके से
बहुत कुछ कहा है
मगर तू
किसी से न कहना
लफ़्ज़ों को पंख लगते देर नहीं लगती
आवारा पंछियों की तरह उड़ कर
कब कौन सी शाख़ों पर बैठ जाएँगे
कौन जाने
तू तो चुप ही रहना
किसी से
कुछ भी
कुछ भी न कहना
हज़ारों बार
मैंने चुपके से
बहुत कुछ कहा है
मगर तू
किसी से न कहना
लफ़्ज़ों को पंख लगते देर नहीं लगती
आवारा पंछियों की तरह उड़ कर
कब कौन सी शाख़ों पर बैठ जाएँगे
कौन जाने
तू तो चुप ही रहना
किसी से
कुछ भी
कुछ भी न कहना
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