Saturday, June 3, 2017


पहचान

आइना देखती हूँ रोज़ाना
पहचान नहीं पाती हूँ उस चेहरे को
जो झाँकता है वापस उस आइने से मेरी तरफ़
 भटक गया है मेरा वजूद
कभी बनाए हुए
तो कभी बताए हुए
रास्तों पर चलते चलते
ओढ़ी हुई मुस्कान
माँगी हुई हँसी
ताकि आसपास चेहरों की मुस्कान बनी रहे
बने बनाए क़दमों की निशानों पर
पैर जमा जमा कर चलते हुए
अब थक चली हूँ
अपने पास वापस आना चाहती हूँ