Monday, January 8, 2018

अब

भीड़ से अलग होने का एहसास
उसी भीड़ में गुम हो गया
आइना कुछ कहने की कोशिश  कर रहा था
एक पुराने कपड़े से ढक कर
उसे चुप कर दिया
वक़्त बहुत बीत गया

आज उसी भीड़ ने
अपने बीच से निकाल कर
फिर अलग खड़ा कर दिया है
आइना अब अपनी बात
साफ़ साफ़ कहने लगा है

जिस लौ पर बहुत सी राख डाल कर
बुझाने चले थे
शायद चिंगारी बन कर
सुलगती रही है बरसों से
आज वो फिर से
एक लपट बन जाने को तैयार है

लगता है
अब
दोनों हाथों को फैला कर
अपने आप से एक नई मुलाक़ात करनी होगी
आँख मिला कर और
आमने सामने हो कर
वरना
बचा हुआ वक़्त
एक सवाल बन कर खड़ा रहेगा
अब तो वक़्त
जवाब देने और पाने का है
सवालों में उलझने का नहीं

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