Wednesday, February 20, 2019

ग़लतियाँ

दरवाज़े बंद हों तो
खिड़कियों से झाँकती हैं ग़लतियाँ
ज़िद्दी हैं
छिपकली सी
रोशनदानों तक ये चढ़ जाती हैं
और कुछ नहीं तो
वक़्त की दरारों से
सीलन बन कर उभर आती हैं ग़लतियाँ
कितनी ही थका लो 
मिटा मिटा कर उँगलियाँ
रूह के काग़ज़ पर से
मिटती कहाँ हैं ग़लतियाँ
सोचा किए
गुज़रे वक़्त का
साफ़ कर दिया है हमने हर कोना
जाने कहाँ से 
मकड़ी के जालों सी
फिर निकल आती हैं ग़लतियाँ
आइने से मुँह सा चिढ़ाती हैं ग़लतियाँ
आगे आगे कितना ही दौड़ें
पीछा नहीं छोड़ती है ग़लतियाँ
पीछा कहाँ छोड़ती हैं ग़लतियाँ