आइना देखती हूँ रोज़ाना
पहचान नहीं पाती हूँ उस चेहरे को
जो झाँकता है वापस उस आइने से मेरी तरफ़
भटक गया है मेरा वजूद
कभी बनाए हुए
तो कभी बताए हुए
रास्तों पर चलते चलते
ओढ़ी हुई मुस्कान
माँगी हुई हँसी
ताकि आसपास चेहरों की मुस्कान बनी रहे
बने बनाए क़दमों की निशानों पर
पैर जमा जमा कर चलते हुए
अब थक चली हूँ
अपने पास वापस आना चाहती हूँ
पहचान नहीं पाती हूँ उस चेहरे को
जो झाँकता है वापस उस आइने से मेरी तरफ़
भटक गया है मेरा वजूद
कभी बनाए हुए
तो कभी बताए हुए
रास्तों पर चलते चलते
ओढ़ी हुई मुस्कान
माँगी हुई हँसी
ताकि आसपास चेहरों की मुस्कान बनी रहे
बने बनाए क़दमों की निशानों पर
पैर जमा जमा कर चलते हुए
अब थक चली हूँ
अपने पास वापस आना चाहती हूँ
No comments:
Post a Comment